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6 January 2024
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भारत में किसान परिवार खेती के साथ भेड़-बकरियों का पालन भी करते हैं। भेड़-बकरियों से मिलने वाले दूध, ऊन, और मांस का कारोबार किसानों को अतिरिक्त आजीविका प्रदान करता है। पशुपालन व्यवसाय में भेड़ का पालन किसानों की कमाई के लिए एक बेहतर जरिया है।गांवों में रहने वाले छोटे और सीमांत किसान छोटी सी जगह से भेड़-बकरियों का पालन शुरू कर सकते हैं। भेड़-बकरियों से मिलने वाले ऊन, खाद, दूध और चमड़ा उत्पादों को बाजार में बेचकर किसान अच्छी कमाई कर सकते हैं। केंद्र और राज्य सरकारें भेड़ पालन में किसानों की मदद के लिए योजनाएं बनाती हैं।


भेड़ की ये 4 नस्लें करती है ज्यादा ऊन उत्पादन


गद्दी नस्ल की भेड़:

  • आमतौर पर मध्यम आकार की भेड़ होती है।
  • शरीर पर सफेद, भूरा, और भूरा-काला रंग पाया जाता है।
  • मुख्य रूप से जम्मू, हिमाचल प्रदेश, और उत्तराखंड में पाई जाती है।
  • नर भेड़ सींग वाले होते हैं, ऊन उत्पादन 437 से 696 ग्राम तक होता है।


दक्कनी (डेक्कनी) नस्ल भेड़:

  • भारत के दक्कन पठार में विकसित हुई नस्ल।/li>
  • भूरे और काले रंग की होती है, ऊन उत्पादन 5 किलोग्राम वार्षिक।
  • मुख्य रूप से राजस्थान, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, और महाराष्ट्र में पाई जाती है।


मांड्या भेड़:

  • कर्नाटक के मांड्या जिला में पाई जाती है।
  • छोटे आकार की होती है और सर्वोत्तम मांस उत्पादन के लिए जानी जाती है।
  • प्रति भेड़ सालाना 0.372 किग्रा ऊन उत्पादन करती है।


नेल्लोर भेड़:

  • उत्तरी आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में पाई जाती है।
  • विभिन्न रंगों में पाई जाती है, ऊन निम्न गुणवत्ता की होती है।
  • नर भेड़ का औसत वजन 36-38 किलोग्राम होता है, जबकि मादा भेड़ का औसत वजन 28 से 30 किलोग्राम होता है।


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